कथक नृत्य की उत्पत्ति – उद्गम समझने से उपयोगिता का अपने आप अनुभव होगा

भारत के सभी शास्त्रीय नृत्य जिस प्रकार मंदिरों में प्रारंभ हुए ठीक उसी प्रकार कथक भी प्राचीन काल में मंदिर में ही प्रारंभ हुआ था।आज कथक का वर्तमान स्वरूप जो है वह पूर्णतया अपने उत्पत्ति समय से अलग है। इसका प्राचीन रूप कुछ कथा वाचक जैसे पंडवानी या अन्य प्रकार के भजन कीर्तन वाले समूह में कतिपय मिल जाता है। चूंकि कथक का अर्थ ही होता है कथा कहने वाला,अतः प्राचीन काल में इसका उद्गम स्थान मंदिरों के कथावाचक से है ।जब वह भक्त जनों को कथा कहते थे और वहां ईश्वर की महिमा गाकर बोलकर कुछ भाव भी दिखते थे तो इससे भक्तों में भक्ति का संचार होता था।


          इस भक्तिमय कथा में विविधता लाने के लिए धीरे धीरे इनमें कृष्ण कथाओं का भी समावेश हुआ। कृष्ण की बाल लीला, गोपियों के साथ छेड़छाड़, हास्य विनोद , राधा के संग प्रेम इत्यादि कुछ ऐसे विषय पर कथाएं होने लगी जो भक्ति के साथ श्रद्धालुओं को आकर्षित भी करने लगे। कथाओं पर नाच कर भाव दिखाने की परंपरा प्रभु के गुणगान को बखूबी प्रचलित किया गया। इस कारण से इस नृत्य को नटवरी नृत्य भी कहा जाने लगा।
             

          

              वर्तमान कथक नृत्य में अधिकांश समावेश राजदरबारों का है। जब मुगल शासन काल आया तब यह नृत्य मंदिरों से राज दरबारो में चला गया। चूंकि यह कलाकारों की रोजी रोटी थी इसलिए उन्हें वही प्रस्तुत करना होता था जो राजाओं को प्रसन्न कर सके। इसके लिए चक्कर , पैर का काम, परण, कलाबाजियां नृत्य में शामिल हुआ। नृत्य में भक्ति भाव का स्थान श्रृंगारिकता ने ले ली। फिर क्या था, नित नए प्रयोग होने लगे, गीत, ठुमरी कवित्त सभी पर भाव होने लगे। यह ज्यादा लोकप्रिय हुआ और सुग्राह्य भी। 

              अंग्रेजी शासन काल में नृत्य की गरिमा कुछ धूमिल सी हो गई। इसमें अध्यात्म तो लगभग समाप्त ही होता गया। न मंदिर न दरबार, यह मात्र कोठे का नृत्य बन कर रह गया। आज के नृत्यकार शुक्रगुजार हैं उन तवायफों का जिन्होंने इस अनोखी नृत्य विधा को लुप्त होने से बचाया। 

              स्वतंत्र भारत में अन्य विभागों की तरह कला संस्कृति भी अपनी पहचान बनाने लगा और आज तो कथक में नित नए प्रयोग हो रहे हैं। कोई इसे सिनेमा के माध्यम से लोकप्रिय बना रहा है तो कोई इसे फिटनेस डांस का नाम देकर। आज के नृत्य में अध्यात्म भी है, श्रृंगार भी, वही मानसिक शांति भी है तो रोजगार भी। आवश्यकता है इसके सही रूप को पहचानने और पाने की। नृत्य सीखकर मात्र सर्टिफिकेट पाना उद्देश्य न होकर इसे जीवन से जोड़कर देखा जाना आवश्यक है। यह किस प्रकार हमें बेहतर बनाता है, किस प्रकार भीड़ से अलग करता है इस पर काम करने की जरूरत है।

धन्यवाद


             


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