लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत नृत्य – दोनों का पारस्परिक संबंध, भविष्य की संभावनाएं

लोक संगीत जैसा कि नाम से ही सिद्ध है यह लोक जीवन के दैनिक क्रियाकलापों पर आधारित है ।ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाज की दिनचर्या और मौसमी उत्सव से इसका जुड़ाव रहा है ,जैसे खेतों में बुवाई और फसल की कटाई, बच्चों का जन्म, शादी विवाह की रस्में  इत्यादि ऐसी चीज हैं जो लोक जीवन के साथ  सभी जगह घटित होता है।

अब प्रश्न यह है कि यह लोक जीवन में प्रारंभ कैसे हैं और इसकी क्या आवश्यकता है ? विज्ञान द्वारा प्रमाणित है कि नृत्य और संगीत एक ऐसा माध्यम है, इसमें वो बात है जो मनुष्य के मानसिक दबाव या स्ट्रेस को कम करने में काफी मदद करता है ।हमारे द्वारा किए जाने वाला कोई सामूहिक काम जो काफी मेहनत वाला है , उसे करते-करते अगर दो पंक्तियां गा लेते हैं या थोड़ा नाच लेते हैं तो वह कार्य आनंददायक और आसान हो जाता है ।

हमारे लोक संगीत में कटाई और बुवाई जैसे भारी भरकम काम के लिए भी गीत हैं जो इसीलिए किए जाते हैं । यहां तक की जांता पिसाई के लिए भी समूह गीत होते है। यहां संगीत की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि यह भारी काम है और अगर दो पंक्तिया महिलाएं मिलकर गा लेंगी तो यह कार्य आसान होगा। इस प्रकार लोक संगीत का सीधा-सीधा सम्बन्ध दैनिक जीवन से है जो मनुष्य के मानसिक तनाव से बचने और स्वयं के मनोरंजन का माध्यम है।

लोक संगीत या नृत्य का कोई शास्त्र नहीं है कोई बंधन नहीं है कोई नियम नहीं है। यह ग्रामीण परिवेश के लोगों द्वारा अपने समाज में होने वाली अलग-अलग उत्सवों ,गतिविधियों में स्वतः निकला हुआ संगीत स्वर और भाव भंगिमाएं हैं जो अलग-अलग क्षेत्र में अपनी अपनी अलग विशेषता लिए हुए हैं ।वहीं इसी नृत्य में से कुछ चीज पढ़े-लिखे समाज में चली गई और उसे नियमों और शास्त्रों की परिधि में बांधा गया । उसके अपने-अपने तरीके बनाए गए और जो गतिविधियां अधिक आकर्षक और अधिक आध्यात्मिक लगी उन्हें अपनाते हुए इसके इर्द-गिर्द ही शास्त्र तैयार किया गया ,और यह नृत्य या संगीत शास्त्रीय नृत्य संगीत बन गया ।अर्थात उत्पत्ति दोनों की लोक जीवन से ही हुई परंतु जिसे कुछ  नियमों और परिधि में बांधा गया और जो पढ़े-लिखे समाज से ताल्लुक रखने लगा वह संगीत शास्त्रीय संगीत कहलाया। जो अब तक अपने मूल रूप में ग्रामीण जनता के बीच बिना किसी बंधन और बिना किसी नियम परिभाषा के विद्यमान रहा वह लोक संगीत और लोक नृत्य कहलाया।

प्राचीन काल में किसी भी ललित कला के किसी भी विधा को संजोने सहेजने का काम राजा महाराजा करते थे अर्थात किसी भी धरोहर का संरक्षण राज्य के शीर्ष पद का होता था। वर्तमान समय में यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह इन धरोहर को संरक्षण देकर क्षेत्र का गौरव बढ़ाए।

आज नृत्य संगीत को सभी विद्यालयों के मुख्य करिकुलम में जोड़ना आवश्यक है ताकि विद्यार्थी सीधे सीधे इससे जुड़ सके। ऐसा करने से न केवल शास्त्रीय नृत्य संगीत का दायरा बढ़ेगा बल्कि लोग इस क्षेत्र में करियर बनाने के बारे में भी सोचेंगे। जब यह मुख्य करिकुलम में होगा तब विज्ञान के शिक्षक की भी उतनी ही आवश्यकता होगी जितनी संगीत नृत्य के शिक्षक की।

बिहार में इस क्षेत्र में सराहनीय कार्य किए गए हैं जिसके तहत बीपीएससी के माध्यम से सभी सरकारी विद्यालयों में संगीत नृत्य के शिक्षक को अच्छे वेतन पर बहाल किया गया है। महाविद्यालयों में भी संगीत /नृत्य /वादन के विषय होते हैं और प्राध्यापक भी होते है। इस कदम से रोजी रोटी वाली समस्या तो नहीं होगी लेकिन कला का निखार, इसकी सहजता , सुंदरता और मूल रूप को संजोए रखने में छोटे बड़े संगीत संस्थाओं और कलाकारों की भी भूमिका है। इसे मजबूती प्रदान करने की आवश्यकता है।

भारतीय सिनेमा में भी कथक नृत्य की दमदार वापसी हो चुकी है। पहले तो बॉलीवुड में कथक को सिर्फ तवायफों के नृत्य में ही दिखाया जाता था और शास्त्रीय नृत्य के रूप में भरतनाट्यम का बोलबाला था। कथक को खूबसूरत बना कर पुनः फिल्मों में वापस लाने में स्वर्गीय पंडित बिरजू महाराज का अहम योगदान है। उनकी रचनात्मकता ने इस नृत्य को इस नृत्य को इतना सिंपल और सुंदर बना दिया कि फिल्मों में यह नृत्य खूब सुर्खियां बटोर रहा है और लोगों के बीच लोकप्रिय बनता जा रहा है।
  


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