भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में कथक एक ऐसा नृत्य है जो अपनी सरल अभिव्यक्ति और कथा कहने की शैली के कारण दर्शकों के लिए आसानी से समझ आने वाला है। ‘कथक’ शब्द का अर्थ ही है – कथा कहने वाला, यानी नृत्य के माध्यम से कहानी कहना।
यदि हम कुछ दशक पीछे जाएं, जब सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रसार नहीं हुआ था, तब सिनेमा ही ऐसा प्रमुख माध्यम था जो लोगों को न केवल मनोरंजन प्रदान करता था बल्कि ज्ञान, फैशन और सांस्कृतिक प्रवाह का भी स्रोत था। इसी सिनेमा के माध्यम से कथक नृत्य आमजनों तक पहुँचा और लोकप्रिय हुआ।
विदुषी सितारा देवी ने कथक को सिनेमा की मुख्यधारा से जोड़कर एक नया आयाम दिया। उन्होंने अपने समय में शुद्ध बनारस घराने की शैली को फिल्मों में प्रस्तुत कर दर्शकों को प्रभावित किया। सितारा देवी और गोपी कृष्ण की जोड़ी ने फिल्मों में कथक को नई पहचान दिलाई, जिससे सामान्य दर्शक भी इसकी ओर आकर्षित होने लगे।
बाद में बड़े आचार्यों जैसे शंभू महाराज और लच्छू महाराज के निर्देशन में फिल्मी अभिनेत्रियाँ भी शास्त्रीय कथक प्रस्तुत करने लगीं। इसका उत्कृष्ट उदाहरण है फिल्म मुग़ल-ए-आज़म का प्रसिद्ध गीत “मोहे पनघट पर नंदलाल”, जिसे शंभू महाराज ने कोरियोग्राफ किया था। इसी प्रकार सत्यजीत रे की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में बिरजू महाराज की शिष्या विदुषी शाश्वती सेन ने शुद्ध कथक प्रस्तुत कर इस फिल्म को गौरवान्वित किया।
समय के साथ हिंदी फिल्मों की प्रमुख अभिनेत्रियाँ भी कथक सीखकर इसे पर्दे पर लाने लगीं। मधुबाला, माधुरी दीक्षित, मीनाक्षी शेषाद्री, हेमा मालिनी, दीपिका पादुकोण जैसे कलाकारों ने कथक की शुद्धता के साथ इसे लोकप्रिय बनाया। हाल के वर्षों में आलिया भट्ट ने भी कथक सीखकर अपनी फिल्मों में इसे प्रस्तुत किया है।
पहले के समय में फिल्मों में अक्सर अलग से नर्तक/नर्तकियाँ होती थीं, लेकिन आज की फिल्मों में मुख्य अभिनेत्री स्वयं कथक को प्रस्तुत कर रही हैं। यही कारण है कि यह नृत्य और भी अधिक लोकप्रिय हो गया है।
आज कथक सिर्फ शास्त्रीय रूप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें फ्यूज़न की भी झलक देखने को मिलती है। रशियन बैलेट और वेस्टर्न डांस की कुछ शैलियों को कथक के साथ मिलाकर नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इस तरह कथक आधुनिकता और परंपरा का अद्भुत संगम बनकर विश्वभर के दर्शकों को आकर्षित कर रहा है।
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