
नंदा देवी, उत्तराखंड के गरवाल हिमालय की एक पवित्र और उँची चोटी, सदियों से हिमालय प्रेमियों, धार्मिक श्रद्धालुओं और पर्वतारोहियों के लिए आकर्षण रही है। मगर क्या आपने सुना है कि 1965 में एक गुप्त मिशन के दौरान वहां एक प्लूटोनियम युक्त निगरानी उपकरण खो गया था? अब, जब सरकार और पर्वत संघ इस पर्वत मार्ग को फिर से खोलने की सोच रही है, उस पुरानी घटना की याद और उसके संभावित जोखिमों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

कैसे खो गया सीक्रेट न्यूक्लियर डिवाइस
मिशन का उद्देश्य
1965 में, शीत युद्ध की विभीषिका के बीच, अमेरिका और भारत ने मिलकर चीन के परमाणु परीक्षणों पर नजर रखने के लिए नंदा देवी की ऊँचाई पर एक रेडियोन्यूक्लाइड थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) स्थापित करने का गुप्त मिशन शुरू किया।
यह उपकरण प्लूटोनियम-कैप्सूलों से संचालित था, और उसका उपयोग दूरस्थ सिग्नल ट्रांसमिशन व निगरानी हेतु किया जाना था।
माना गया कि दुर्घटना हुई
जैसे ही टीम Camp IV (लगभग 23,700–24,000 फीट) से आगे बढ़ने लगी, वहाँ एक भीषण हिम-तूफान (blizzard) आ गया। उपकरण को एक चट्टानी क्रीविस (crevice) में सुरक्षित करने की कोशिश की गई, लेकिन परिस्थिति विकट होने पर टीम को वापिस लौटना पड़ा।
अगले वर्ष (1966) भारत और अमेरिका दोनों की खोज टीमों ने वहाँ से उस उपकरण को निकालने की कोशिश की, लेकिन कोई निशान नहीं मिला।
माना जाता है कि संभवतः उपकरण हिम-फटना या भूक्षरण द्वारा ग्लेशियरों की ओर बह गया हो।
परिणाम और विवाद

लोक स्तर पर यह विश्वास है कि उस खोए उपकरण की वजह से इलाकों में रेडियोधर्मी प्रदूषण हो सकता है, और यह ग्लेशियरों को पिघलाकर बाढ़ को प्रेरित कर सकता है।
वैज्ञानिकों द्वारा कुछ परीक्षणों में मिट्टी और पानी में प्लूटोनियम के संकेत मिले, पर निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हुए।
1978 में, उस मिशन की खबर सार्वजनिक हुई और भारत सरकार ने इस मुद्दे की समीक्षा हेतु एक समिति बनाई। पर्यावरणविद और स्थानीय लोग लगातार यह तर्क देते रहे कि इस क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को खतरा हो सकता है यदि पर्वतारोहियों और मानव हस्तक्षेप को अनुमति दी गई।
मार्ग खोलने की अनुमति: अवसर और चुनौतियाँ
नए प्रस्ताव और उत्साह
2025 में, भारतीय पर्वतारोहण संस्था (IMF) और उत्तराखण्ड सरकार ने नंदा देवी मार्गों को नियंत्रित ढंग से खोलने पर चर्चा शुरू कर दी है।
अगर अनुमति मिले तो पर्वतारोहियों को सीमित संख्या में ट्रेकिंग/चढ़ाई की अनुमति दी जाएगी, सख्त नियमों और पर्यावरण निगरानी के साथ।
खतरे और सावधानियाँ
रेडियोधर्मी जोखिम: खोए हुए उपकरण की जगह अज्ञात है — यदि वह अभी भी सक्रिय है, तो आसपास के इलाकों में रेडियोधर्मी रिसाव का खतरा हो सकता है।
पारिस्थितिकी संरक्षण: नंदा देवी नेशनल पार्क और पवित्र संरक्षण क्षेत्र अतिसंवेदनशील हैं — अधिक मानव हस्तक्षेप जैव विविधता को क्षति पहुंचा सकता है।
लेखा-जोखा, जिम्मेदारी: यदि पुनरुद्धार के दौरान किसी भी तरह का पर्यावरणीय नुकसान या रेडियोधर्मी जोखिम बने, तो इसका दायित्व किसका होगा?
स्थानीय एवं सांस्कृतिक मान्यताएँ: नंदा देवी को एक देवी के रूप में पूजा जाता है — स्थानीय लोगों की भावनाएँ और धार्मिक मान्यताएँ इस उद्घाटन को सहजता से स्वीकार करें यह सुनिश्चित करना होगा।
निष्कर्ष
नंदा देवी का यह रहस्य — कि एक प्लूटोनियम उपकरण हिम में खो गया — आज भी वैज्ञानिक, पर्यावरणविदों और जनता के लिए एक गहरी चिंता है। यदि हम इस पवित्र पर्वत को फिर से खोलने की अनुमति दें, तो हमें सर्वोच्च सतर्कता, वैज्ञानिक पद्धति और सम्मान के साथ आगे बढ़ना होगा। यह केवल पर्वतारोहियों की जीत नहीं होगी — बल्कि यह इस निर्णय का प्रमाण होगा कि हम प्रकृति और इतिहास दोनों का सम्मान करते हुए साहस भी कर सकते हैं।
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