कथक में पुरुषों की भूमिका और सामाजिक पहचान : नृत्य की दुनिया में लैंगिक संतुलन की यात्रा

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा में कथक एक अत्यंत अभिव्यक्तिपूर्ण और भावनात्मक नृत्य शैली है। इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि आरंभ में यह कला भी पुरुषों के वर्चस्व में थी। नृत्य की उत्पत्ति स्वयं भगवान शिव – नटराज से मानी जाती है, जो सृष्टि के ताल और लय के प्रतीक हैं। बाद में मां पार्वती द्वारा लास्य अंग की रचना हुई, जो कोमलता और भावनात्मकता का प्रतीक है, और जिसे स्त्रियों के लिए उपयुक्त माना गया।

भारतीय समाज में परंपराओं और पारिवारिक व्यवसायों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सदैव पुरुषों पर ही रही है — चाहे वह दर्जी हो, पुजारी हो या कारीगर। उसी प्रकार कथक की विरासत भी पहले पुरुषों द्वारा ही संभाली जाती थी। लेकिन जब यह नृत्य दरबारों तक पहुँचा, तो परिदृश्य बदलने लगा। यहाँ नृत्य केवल आध्यात्मिक साधना नहीं रहा, बल्कि मनोरंजन और सौंदर्यबोध का माध्यम बन गया। चूंकि भावनात्मक रस का सृजन महिलाओं द्वारा सहज रूप से होता है, इसलिए महिलाएं नृत्य के क्षेत्र में अग्रणी बन गईं।

आज के समय में पुरुष और महिला दोनों ही कथक नृत्य में सक्रिय हैं, परंतु उनकी चुनौतियाँ अलग हैं।
महिला नर्तकियों के सामने समाज और परिवार की कई बाधाएँ होती हैं — विवाह, घर की जिम्मेदारियाँ, नौकरी आदि। वहीं पुरुष नर्तकों को इस क्षेत्र में सामाजिक स्वीकार्यता पाने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि शास्त्रीय नृत्य को प्रायः ‘स्त्रैण कला’ के रूप में देखा जाता है। फिर भी जो पुरुष नर्तक अपनी साधना, एकाग्रता और समर्पण से आगे बढ़ते हैं, वे अपनी विशिष्ट पहचान बना लेते हैं।

बचपन में नृत्य सीखने वालों में लड़कियों की संख्या अधिक होती है, जबकि लड़के कम दिखाई देते हैं। किंतु उम्र बढ़ने के साथ, कई महिलाएँ सामाजिक कारणों से नृत्य छोड़ देती हैं, जबकि पुरुष, यदि एक बार निर्णय ले लें कि इसे पेशे के रूप में अपनाना है, तो वे आमतौर पर लगातार जुड़े रहते हैं।

इसलिए सफलता का निर्धारण लिंग से नहीं, बल्कि निरंतरता, एकाग्रता और समर्पण से होता है।

कला अंततः एक निजी साधना है। प्रत्येक कलाकार अपनी अनुभूति और दृष्टिकोण से उसे व्यक्त करता है। सच्चा कलाकार वही है जो शून्य में भी दृश्य उत्पन्न कर दे, बिना बोले संवाद कर सके, और अपने नृत्य से रस की उत्पत्ति करे। चाहे वह पुरुष हो या महिला — जो दर्शकों के हृदय से जुड़ सके, वही वास्तव में नृत्य का सच्चा साधक है।

Reference:

https://narthaki.com/


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