बच्चों का भावनात्मक विकास बहुत ही छोटी उम्र से — यानी जीवन के पहले वर्ष से ही शुरू हो जाता है। अगर माताएं इस समय से ही कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखें, तो उनके बच्चे बड़े होकर मानसिक और भावनात्मक रूप से बेहद मजबूत बन सकते हैं।
अक्सर देखा गया है कि जब मां-पिता किसी काम में व्यस्त होते हैं, तो वे बच्चे को अकेले बिस्तर पर सुला देते हैं। आपने महसूस किया होगा कि बच्चा नींद में कभी-कभी किसी सपने या शारीरिक हरकत से चौंककर जाग जाता है। यह झटका उसके दिमाग पर असर डाल सकता है या उसे डरा सकता है।
अगर मां उस समय बच्चे के पास लेटी हो और उसे अपने सीने से लगाकर सुला रही हो, तो ऐसा झटका कम लगता है। बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा का एहसास होता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब मां को कोई ज़रूरी काम हो और वह अकेले बच्चे को देख रही हो, तो क्या किया जाए?
कुछ लोग तकिया बच्चे के पास रख देते हैं ताकि उसे लगे कि कोई पास है, लेकिन वह तकिया मां के स्पर्श की जगह नहीं ले सकता। यह सुनने में साधारण बात लग सकती है, लेकिन बच्चे के आत्मविश्वास की नींव इसी से बनती है।

अब मार्केट में ऐसे कई प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं, जिन्हें “टॉडलर पिलो” कहा जाता है। कुछ वेबसाइट्स पर हाथ के आकार वाले पिलो मिलते हैं, जो बच्चे को यह एहसास कराते हैं कि कोई उनके पास ही सो रहा है। इससे बच्चा नींद में चौंकता नहीं और उसके दिमाग पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता।
तो क्यों न इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखकर हम अपने बच्चों को जन्म से ही मानसिक, बौद्धिक और भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाएं, ताकि वे आगे चलकर हर परिस्थिति का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सकें?
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