भारत और यूरोप के वर्क कल्चर में अंतर कितना गहरा है, इसका अंदाजा जर्मनी में काम कर रहे भारतीय इंजीनियर कौस्तव बनर्जी के अनुभव से लगाया जा सकता है। उनके मुताबिक भारत में काम का मतलब अक्सर लगातार दबाव, लंबे घंटे और बिना रुके डिलीवरी से ही जुड़ा होता है। इसके विपरीत जर्मनी और यूरोप में काम के साथ-साथ इंसान की जिंदगी, उसकी मानसिक शांति और उसके निजी समय को भी बराबर प्राथमिकता दी जाती है।

सिर्फ कॉरपोरेट ही नहीं, भारत का सरकारी तंत्र भी धीरे-धीरे इसी टॉक्सिक वर्क कल्चर को अपनाता जा रहा है। सरकार के कुछ विभाग तो इस हद तक पहुंच चुके हैं कि छुट्टियों में भी कार्यालय खुलवाना उनके लिए सामान्य बात हो गई है। स्थायी कर्मचारी फिर भी थोड़ा बहुत विरोध कर लेते हैं, लेकिन उन्हें भी कुछ न कुछ घंटे आना पड़ता है। संविदा कर्मियों की स्थिति और भी खराब है—उन्हें तो संविदा समाप्त करने की धमकी देकर सभी अवकाशों में बुलाना अधिकारियों का अधिकार बन चुका है।
असल मुद्दा यह है कि नियमित कार्यदिवस में काम पूरा न होना सिर्फ कर्मचारियों की गलती नहीं, बल्कि उच्चाधिकारियों की कार्यकुशलता की कमी भी है। अगर काम करवाने की रणनीति ही गलत होगी तो आउटपुट कमजोर होना तय है। सच यह है कि काम उतना कठिन होता नहीं जितना उसे बना दिया जाता है। कार्यशैली ऐसी है कि मानो पूरा जोर इस बात पर लगता हो कि कार्य को कैसे और जटिल बनाया जाए। नोडल अधिकारी न तो काम का सही ज्ञान रखते हैं और न ही सीखने की इच्छा। उनका ध्यान बस नकारात्मक पहलुओं पर और अपने बचाव पर ही रहता है—क्योंकि न टीम पर भरोसा है और न ही विषय का सारगर्भित ज्ञान।
ऐसे में सवाल उठता है—इतनी कठिन परीक्षाएं पास कर ये लोग नौकरी में आते कैसे हैं? क्या केवल रट्टा मारकर नंबर ले आते हैं या फिर किताबों का ज्ञान वास्तविकता में उतारने की क्षमता ही नहीं है?
आज के छोटे-बड़े अधिकांश अधिकारी इसी प्रकार काम कर रहे हैं। कुछ सिस्टम की खामियों के कारण, तो कुछ अपनी अज्ञानता के चलते। और इसकी कीमत चुकानी पड़ती है उन सभी को, जो उनके साथ काम करते हैं।
शायद अब समय है कि नीति निर्माण और प्रशिक्षण व्यवस्था यूरोपीय देशों से कम से कम यह सीख ले कि उत्कृष्ट काम तभी होता है जब टीम मानसिक दबाव में न हो। वरना परिणाम हमेशा वही रहेगा—
सब दुखी, सब हताश, और कार्य की रफ्तार शून्य।
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