theory part of kathak dance,1st and 2nd year theory syllabus with answers कथक के परिभाषिक शब्दों की परिभाषा, नृत्य की परिभाषा, ध्वनि एवं नाद में अंतर

नृत्य – शरीर के विभिन्न अंगों के संचालन द्वारा मन के भाव प्रकट करने को नृत्य कहते हैं। नृत्य संगीत का एक अंग है। संगीत के अन्य अंग हैं गायन और वादन। तीनों एक दूसरे के सहायक होते हैं और तीनों के सहयोग से संगीत पूर्ण होता है। नृत्य के मुख्य दो प्रकार हैं- पहला लोक नृत्य और दूसरा शास्त्रीय नृत्य। किसी शुभ अवसर, पर्व या सफलता प्राप्त करने पर खुशी में थिरकने को देसी या लोक नृत्य कहते हैं। ऐसे नृत्यों में कोई नियम नहीं होता। जो नृत्य नियमबद्ध होता है अर्थात् जिसमें नियमानुसार सिर से पैर तक शरीर के विभिन्न अंग चलाये जाते हैं शास्त्रीय नृत्य कहलाता है। इस प्रकार के नृत्य में सफलता प्राप्त करने के लिए कठिन साधना करनी पड़ती है।
नाट्य- नाट्य का अर्थ है नाटक करना। जब किसी पात्र की वेश-भूषा, चाल-ढाल, बोली तथा अंग-संचालन की नकल की जाय अथवा किसी कथा के अनुसार अभिनय किया जाय तो उसे नाट्य कहते हैं।
कथक नृत्य – यह मुख्यतः उत्तर प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है। कथक शब्द का अर्थ है कथा कहने वाला। प्रारंभ में जो कलाकार कथा कहते हुए इस पर भाव भंगिमाएं दिखाते थे उन्हें कथक कहते थे। बाद में इस नृत्य शैली का नाम ही कथक हो गया।
इसका प्रचार उत्तर भारत के अन्य प्रान्तों में भी है। इसे पुरूष और स्त्री दोनों अपनी-अपनी विशिष्ट वेश भूषा में करते हैं। एक व्यक्ति किसी वाद्य पर लहरा देता है तो दूसरा तबला या पखावज से संगति करता है। नर्तक आमद, ठाठ, बोल, तोड़े, परन, टुकड़े, ततकार आदि तैयारी और सफाई के साथ दिखाता है। इस नृत्य में घुँघरू का जैसा जटिल प्रयोग होता है वैसा दुनिया के अन्य किसी नृत्य में नहीं होता।
तत्कार –
कथक नृत्य में पैरों में घुँघरू बाँधने की परम्परा है। लय में पैरों के संचालन से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ततकार कहते हैं जैसे ता थेई थेई तत। ता थेई ध्वनि के कारण उसे प्रारम्भ में तथकार कहा गया जो बिगड़ता-बिगड़ता ततकार हो गया। इसका महत्व शास्त्रीय नृत्यों में विशेषकर कथक नृत्य में बहुत है। ततकार के द्वारा नर्तक लयकारी और चमत्कार दिखाता है। प्रत्येक ताल की ततकार उस ताल की मात्रा और विभाग के अनुसार अलग-अलग होती है। तबले के समान ततकार के भी पलटे और लय-बाँट होते हैं।
ठाट-
सर्वप्रथम नर्तक रंगमंच (स्टेज) में प्रवेश करता है और एक मुद्रा (पोज़) में खड़ा हो जाता है। फिर ताल के साथ नेत्र, भौंह, गरदन, कलाई को चलाता है। बीच-बीच में वह छोटे-छोटे टुकड़े लेकर सम पर मिल जाता है और खड़े होने की मुद्रा बदलता है। कथक नृत्य आरम्भ करने की इस विधि को ठाट कहते हैं। कुछ विद्वान टुकड़ा अथवा परन के बाद एक मुद्रा में खड़े होने को ठाट कहते हैं। ठाट में भाव प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों का लयबद्ध सुन्दर संचालन होता है। ठाट को कथक नृत्य की प्रस्तावना (प्रारम्भ) कहते हैं।
सलामी –
इसे नमस्कार भी कहते हैं। राज दरबारों में पहले नर्तक नृत्य के किसी तोड़े द्वारा राजा को नमस्कार करता था जिसे सलामी कहा जाता था। सलामी इस प्रकार समाप्त होती है कि सम पर सलाम या नमस्कार करने की मुद्रा आती है। स्व० कालिका व बिंदादीन महाराज ने अनेक सलामी तोड़े बनाये। मुसलमानी और अंग्रेजी राज्य समाप्त होने के बावजूद भी सलामी शब्द का प्रयोग होता चला आ रहा है। इसे नमस्कार कहना उचित है।
आमद –
जिस टुकड़े से नर्तक अपना नृत्य प्रारम्भ करता है अथवा जिस बोल को करते हुए मंच पर आता है उसे आमद कहते हैं। ठाट के बाद आमद का टुकड़ा नर्तक नाचता है।
गत भाव-
इसमें नर्तक अकेले ही किसी कथानक के भाव को अंग-संचालन द्वारा प्रकट करता है। नर्तक सभी पात्रों का अभिनय अकेले ही एक दूसरे के बाद करता है जैसे कृष्ण लीला में कभी कृष्ण, कभी गोपियाँ, कभी ग्वाल-बाल और कभी माँ यशोदा का अभिनय करता है। नर्तक अधिकतर पौराणिक कथानकों का चयन करता है। जयपुर घराने में इसका विशेष विकास हुआ।
गत निकास –
इसमें नर्तक किसी एक मुद्रा में निकल कर आता है और उसी मुद्रा में ठाह व दुगुन में चलन करके दिखाता है। निकास का अर्थ निकलना। गत-निकास का विकास लखनऊ घराने में विशेष रूप से हुआ।
यह कथक नृत्य का सुन्दर अंग है।
टुकड़ा-तोड़ा-
नृत्य में तालबद्ध बोलों के छोटे समूह को टुकड़ा और बड़े समूह को तोड़ा कहते हैं। टुकड़ा और तोड़ा दोनों समाप्त होने पर सम पर आते हैं। टुकड़ा छोटा होता है और तोड़ा बड़ा होता है। तोड़ा में विभिन्न लयकारियाँ भी दिखाई जाती हैं। कुछ विद्वान् तोड़ा और टुकड़ा में कोई भेद नहीं मानते।
पढ़न्त –
कभी-कभी नर्तक नृत्य के किसी बोल की बारीकियों को समझाने के लिये उसे नाचने के पहले मुख से पढ़कर लय-ताल में सुना देता है जिसे पढ़न्त कहते हैं। पढ़न्त सुनने के बाद वह तोड़ा साधारण श्रोता के लिये अधिक बोधगम्य हो जाता है। संक्षेप में नृत्य या तबले के किसी बोल को लय-ताल में सुनाना पढ़न्त कहलाता है।
अंग

मनुष्य के शरीर के विभिन्न हिस्सों को अंग कहा गया है। नृत्य में मुख्य 6 अंग माने गये हैं- सिर, हाथ, वक्ष (सीना), बगल, कमर और पैर।
प्रत्यंग –
शरीर के अंगों को जोड़ने वाले भाग जिसे नृत्य करते समय सरलता से मोड़ा जा सकता है, प्रत्यंग कहलाता है। ये मुख्य 6 हैं- गर्दन, कन्धा, पीठ, बांह, जंघा और पुष्टिका। इनके अतिरिक्त कलाई, पंजा, हाथ की कुहनी और पैर के घुटने भी प्रत्यंग कहलाते हैं।
उपांग
शरीर के छोटे-छोटे अंगों को उपांग कहा गया है जो नृत्य के लिये बड़े आवश्यक हैं जैसे धड़ या सिर के 12 उपांग हैं- नेत्र, भौं, आँख की पुतली, पलक, ओठ, दाँत, जबड़ा, जीभ, मुख, नाक, गाल और ठुड्डी। इसी तरह पैर के उपांग हैं- एड़ी, टखना, पंजा और उँगलियाँ।
लय –
गायन, वादन तथा नृत्य की रफ्तार को लय कहते हैं। संगीत में लय बहुत आवश्यक है। बिना लय के संगीत नहीं हो सकता। लय के तीन प्रकार माने गये हैं-
(1) विलम्बित लय, (2) मध्य लय और (3) द्रुत लय।
विलम्बित लय – जब लय बहुत धीमी होती है तो उसे विलम्बित लय कहते हैं।
मध्य लय- साधारण लय को मध्य लय कहते हैं।
दुत लय -जब लय तेज होती है तो उसे द्रुत लय कहते हैं।
संगीतज्ञ अपनी इच्छानुसार लय धीमी तेज कर लेता है। मोटे तौर से विलम्बित लय की दूनी मध्य और मध्य की दूनी द्रुत लय कही जाती है।
मात्रा
संगीत में समय नापने के पैमाने को मात्रा कहते हैं। जिस प्रकार तौल नापने के लिये कि०ग्राम आदि बनाये गये, लम्बाई नापने के लिये से०मीटर, मीटर बनाया गया, उसी प्रकार संगीत में समय नापने के लिए मात्रा बनाया गया। विलम्बित लय में एक मात्रा बड़ा, मध्य लय में साधारण और द्रुत लय में छोटा होता है।
ताल
विभिन्न मात्राओं के समूह को ताल कहते हैं। यह ‘काल’ नापने का एक पैमाना है। केवल मात्रा से काम पूरा नहीं होता इसलिये ताल बनाये गये। ताल मात्राओं का एक समूह है। सोलह मात्रे का समूह तीनताल और दस मात्रे का समूह झपताल कहलाता है।
आवर्तन – किसी ताल की पूरी मात्राओं या उसके सम्पूर्ण बोल से एक आवर्तन होती है, जैसे धा धी ना। धा तू ना। से दादरा ताल की एक आवर्तन या आवृत्ति पूरी होती है।
ठेका-

किसी ताल के निश्चित बोल को ठेका कहते हैं, जैसे झपताल का ठेका धी ना। धी धी ना, आदि है। ठेका को तबले अथवा पखावज पर बजाया जाता है।
सम-
प्रत्येक ताल की पहली मात्रा सम कहलाती है। सम पर पहली ताली पड़ती है। तबले का ठेका सम से अर्थात् पहली मात्रा से शुरू किया जाता है। गाने, बजाने व नृत्य में सम पर एक विशेष प्रकार का जोर पड़ता
ताली-खाली हाथ से ताल लगाते समय सम के बाद जहाँ पर ताली देते हैं उसे ताली या भरी और जहाँ हाथ एक ओर हिला देते हैं उसे खाली कहते हैं।
विभाग
प्रत्येक ताल के कुछ स्वाभाविक खण्ड या हिस्से होते हैं जिन्हें विभाग कहते हैं, जैसे तीनताल में चार विभाग होते हैं।
ध्वनि –
जो कुछ हम कानों द्वारा सुनते हैं वह ध्वनि है। गायन की आवाज भी ध्वनि है, बालक के रोने की आवाज भी ध्वनि है तथा स्कूटर, मोटर आदि से जो आवाज उत्पन्न होती है वह भी ध्वनि है। कुछ ध्वनियों को लोग सुनना पसन्द करते हैं और कुछ को नहीं। संगीत का सम्बन्ध केवल उस ध्वनि से है जो मधुर है। संगीत में मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं।
ध्वनि की उत्पत्ति – ध्वनि की उत्पत्ति कम्पन से होती है। जब किसी वाद्य को बजाते हैं तो उसमें कम्पन होता है और ध्वनि उत्पन्न होती है, जैसे सितार अथवा बेला में तार के कम्पन से; ढोलक, तबला और पखावज में चमड़े के कम्पन से और बाँसुरी व शहनाई में हवा के कम्पन से ध्वनि उत्पन्न होती है। संगीत में कम्पन को आन्दोलन कहते हैं।
नाद
नियमित और स्थिर आन्दोलन-संख्या वाली मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं। दूसरे शब्दों में संगीतोपयोगी मधुर ध्वनि को नाद कहते हैं। संगीत में इसी ध्वनि का उपयोग होता है। संगीत में प्रयोग की जाने वाली ध्वनि नियमित तथा मधुर होती है। जो ध्वनि मधुर नहीं होती, न तो वह नाद कहलाती है और न संगीत में प्रयोग की जाती है।
नाद की विशेषताएँ- नाद की तीन विशेषतायें अथवा लक्षण माने जाते हैं-
(1) नाद का छोटा अथवा बड़ा होना।
(2) नाद की ऊँचाई अथवा निचाई।
(3) नाद की जाति अथवा गुण।
मुद्रा

मुद्रा शब्द कई अर्थों में प्रयोग किया जाता है। साधारण व्यवहार में मुद्रा से सिक्का (रुपया) समझा जाता है। वेद-पाठ में मुद्रा का अर्थ हाथों द्वारा संकेत समझा जाता है। नृत्य में भावों को प्रकट करने के लिये शरीर की एक विशिष्ट स्थिति को मुद्रा कहा गया है। नृत्य में मुद्रा का बड़ा महत्व है। इसे नृत्य की भाषा कहा गया है। विभिन्न प्रकार के हाथ के संचालन से मुद्रा की रचना होती है। प्राचीन शास्त्रों में मुद्रा को हस्त या हस्ताभिनय कहा गया है। हाथ-संचालन की दृष्टि से मुद्रा के दो प्रकार हैं-
(1) संयुक्त मुद्रा और
(2) असंयुक्त मुद्रा ।

संयुक्त मुद्रा – दोनों हाथों के संयोग से जो स्थिति बनती है उसे संयुक्त मुद्रा कहते हैं, जैसे- शंख, कमल, हंस, कपोत आदि।
असंयुक्त मुद्रा- एक हाथ से जो स्थिति बनती है उसे असंयुक्त मुद्रा कहते हैं, जैसे पताका, अर्धचन्द्र आदि।
हस्त मुद्रायें मुख्य 24 मानी गई हैं। इसके प्रमाण में पं० शाङ्गदेव लिखित ‘संगीत रत्नाकर’ में है।
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