
टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष रतन टाटा का निधन 9 अक्टूबर 2024 को हुआ। उनका पूरा जीवन सादगी, सेवा और प्रेरणा का प्रतीक रहा। वे केवल एक बिजनेसमैन नहीं बल्कि मानवता के सच्चे सेवक थे। देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिने जाने के बावजूद वे हमेशा दिखावे से दूर और सादगीपूर्ण जीवन जीते रहे।
बचपन की कठिनाइयाँ और परिवार
28 दिसंबर 1937 को पारसी परिवार में जन्मे रतन टाटा का बचपन संघर्षों से भरा रहा। 1948 में उनके माता-पिता अलग हो गए थे, जिसके बाद उनकी परवरिश उनकी दादी नवाज बाई टाटा ने की। दादी ने ही उनके जीवन में अनुशासन, सादगी और दृढ़ता के संस्कार डाले।
अमेरिका में उच्च शिक्षा
शिक्षा पूरी करने के बाद रतन टाटा ने अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से बी.आर्क की डिग्री हासिल की। पारिवारिक कारोबार होने के बावजूद उन्होंने स्वतंत्र रूप से काम करना चुना और लॉस एंजिल्स की कंपनी जोन्स एंड इमन्स में नौकरी की। 1962 में दादी की तबीयत बिगड़ने पर वे भारत लौट आए और फिर टाटा समूह से जुड़ गए।
एक साधारण कर्मचारी से शुरुआत

भारत लौटने के बाद रतन टाटा ने अपने पारिवारिक कारोबार में मालिक की तरह नहीं बल्कि एक साधारण कर्मचारी के रूप में शुरुआत की। उन्होंने Tata Steel में मजदूरों के साथ काम किया, जहां वे खुद चूना पत्थर भट्टियों में डालते थे। यहीं से उन्होंने बिजनेस के मूल सिद्धांत और कर्मचारियों की मुश्किलों को करीब से समझा।
1991 में मिली टाटा समूह की कमान
1991 में J.R.D. टाटा ने रतन टाटा को समूह की कमान सौंपी। उनके नेतृत्व में टाटा समूह ने नए आयाम स्थापित किए। Tata Motors, Tata Tea, TCS, Tata Steel जैसी कंपनियों ने वैश्विक पहचान बनाई। जगुआर लैंड रोवर और कोरस स्टील का अधिग्रहण रतन टाटा की दूरदर्शिता का प्रतीक बना।
सम्मान और उपलब्धियाँ
रतन टाटा को भारत सरकार की ओर से पद्म भूषण (2000) और पद्म विभूषण (2008) से सम्मानित किया गया। विदेशों में भी उन्हें ऑर्डर ऑफ ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस सहित कई देशों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुए। वे विश्वभर में भारतीय उद्योग का चेहरा बने।
आम आदमी का सपना: टाटा नैनो
हर भारतीय को कार की सवारी का सपना पूरा करने के लिए रतन टाटा ने 2008 में टाटा नैनो लॉन्च की। सिर्फ 1 लाख रुपये की कीमत में कार उपलब्ध कराकर उन्होंने दिखाया कि बड़े सपने देखने वाला व्यक्ति हर वर्ग के लिए कुछ बड़ा कर सकता है।
अंतिम वर्ष और प्रेरणादायक विदाई
2024 में, 86 वर्ष की उम्र में भी रतन टाटा सामाजिक रूप से सक्रिय रहे। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024 में अपना आखिरी वोट डाला। स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद वे मतदान केंद्र पर उत्साह के साथ पहुंचे।
9 अक्टूबर 2024 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी हर भारतीय के दिल में जीवित हैं।
अपने किसी भी कार्य को करने में चाहे वह टीसीएस, टाटा स्टील, टाटा मोटर, या नैनो की बात हो वह अपने एक मशहूर वाक्य के लिए खास जाने जाते है
“मैं सही निर्णय लेने में विश्वास नहीं करता, मैं निर्णय लेता हूं और उसे सही कर देता हूं “
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